छत्तीसगढ़ की राजधानी में एम्स, रायपुर की स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल, आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता…
छत्तीसगढ़/नई दिल्ली , छत्तीसगढ़ में केन्द्रीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं को लेकर एक मात्र सबसे बड़ा अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान या जिसे हम एम्स के नाम से जानते हैं वो राजधानी रायपुर में स्थित है। पंरतु ये हमेशा विवादों में घिरा रहता है, कभी मरीजों के नाम पर या कभी ठेका कर्मचारियों के नाम पर। कमीशन खोरी तो यहां का मुख्य धंधा ही बन चुका है। हजारों करोड़ खर्च के बाद भी यहां छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया को सिर्फ अपमान और धक्के ही मिलते हैं। इस अस्पताल की नींव तात्कालिक केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज ने रखीं थीं और बहुत ही तीखा तंज तात्कालिक मुख्यमंत्री अजीत जोगी को किया था कि भाई अपनी बहन से हर बार कुछ मांग ही रखता है( इस कार्यक्रम को मैंने कव्हरेज के रूप में किया था और यह सत्य घटनाओं में से एक है)। ख़ैर राजनैतिक शुचिता अलग प्रश्न है पंरतु ये केन्द्रीय स्तर का अस्पताल छत्तीसगढ़ के लिए अति महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने एम्स रायपुर में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, मरीजों के रेफरल और अस्पताल प्रशासन की गहरी उदासीनता को लेकर लोकसभा में बहुत कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। वास्तव में एम्स, रायपुर में बिस्तरों की उपलब्धता, मरीजों के रेफरल करने की प्रक्रिया, संसाधनों की कमी और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल भी उठ रहे है।
सांसद , रायपुर के प्रश्न पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने बताया कि, एम्स रायपुर में 33 विभागों में 1098 बिस्तर उपलब्ध हैं । यहां मई 2024 से सितंबर 2024 तक केवल 6 महीनों में ही 2546 मरीजों को अन्य अस्पतालों में रेफर किया गया। हालांकि मरीजों का रेफरल मानक चिकित्सा प्रोटोकॉल और उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए किया जाता है।पर प्रश्न यह है कि एम्स प्रशासन ने इन मरीजों को कहां रिफर किया और क्यों किया?
जहां केन्द्रीय मंत्री ने बताया कि, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM) के तहत 150 बिस्तरों वाले क्रिटिकल केयर अस्पताल ब्लॉक की स्थापना को मंजूरी दे दी गई है। इस पर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने अस्पताल प्रशासन पर ही सवाल उठाए और कहा कि “एम्स रायपुर में बिस्तरों की उपलब्धता के बावजूद मरीजों को भर्ती करने से मना किया जाता है,एम्स स्टाफ द्वारा मरीजों और उनके परिजनों के साथ किए जा रहे अभद्र व्यवहार की लगातार शिकायतें मिल रही हैं। यहां तक कि आपातकालीन वार्ड में भर्ती मरीजों को चार घंटे बाद जबरन छुट्टी दे दी जाती है।” इस संबंध में एम्स अस्पताल प्रबंधन को पहले भी पत्र लिखा था, लेकिन उचित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने एम्स डायरेक्टर अशोक जिंदल की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि “जब भी मैने खुद या मेरे कार्यालय से एम्स रायपुर से संपर्क करने की कोशिश की गई, डायरेक्टर ने कोई जवाब नहीं दिया। यह रवैया पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना है।
क्या प्रदेश के नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित होने देना चहिए? एम्स रायपुर में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए हर आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं और कार्य में लापरवाही बरतने वाले दोषियों को क्यों बख्शा जा रहा है या सब कुछ सेटिंग पर आधारित है? वैसे भी छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल-बेहाल है और वो खुद वेंटिलेटर पर है। क्या उन पर कठोर कानूनी कार्यवाही सुनिश्चित की जायेगी? प्रश्न एम्स प्रशासन को देना है, वो जवाबदेही से बच नहीं सकते, अन्यथा कार्यपालिका के साथ विधायिका और न्यायपालिका अभी जीवित है भले ही वो आई.सी.यू. में हो पर जीवित तो है..?
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