पोस्ट झारखंड के सुटूर गाँवों में पानी की टंकी का इस्तेमाल बहुत ही गिने-चुने घरों में है। इसीलिए open defecation की समस्या अभी भी है। जो आदिवासी भाई-बहन अगर इंजीनियरिंग किए हैं व्या आप बता सकते हैं कि झारखंड के गाँवों में इस तरह का टॉयलेट मॉडल काम कर सकता है ? इसमें क्या फायदे और नुकसान हैं ? क्या इससे बेहतर कोई और विकल्प है ? क्या इसी टॉयलेट मॉडल को कुछ और innovation करके सुधारा जा सकता है ?

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