बस्तर, 30 सितंबर 2026।
बैलाडीला क्षेत्र के नंदराज पहाड़ में प्रस्तावित खनन को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। पहाड़ को स्थानीय आदिवासी समाज आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर देखता है। इसी वजह से यहां खनन की किसी भी पहल को लेकर पर्यावरण, ग्रामसभा के अधिकार और स्थानीय समुदाय की सहमति जैसे मुद्दे सामने आ रहे हैं।
नंदराज पहाड़ को सरकारी दस्तावेजों में डिपॉजिट-13 के नाम से जाना जाता है और यह क्षेत्र लौह अयस्क के भंडार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए यह क्षेत्र केवल खनिज संसाधन नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखने वाला स्थान है।
इस क्षेत्र में खनन के विरोध का मुद्दा पहले भी बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। वर्ष 2019-20 के दौरान नंदराज पहाड़ को बचाने की मांग को लेकर बड़ी संख्या में ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों ने आंदोलन किया था। उस दौरान ग्रामसभा से जुड़े पुराने विवाद और खनन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।
अब दोबारा खनन की संभावनाओं की चर्चा के बीच स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि विकास परियोजनाओं में ग्रामसभा की भूमिका, आदिवासी अधिकारों और पर्यावरणीय प्रभावों को किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बस्तर में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ-साथ यहां रहने वाले समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। वहीं खनन से जुड़े पक्ष आम तौर पर रोजगार, औद्योगिक विकास और खनिज संसाधनों के उपयोग को विकास से जोड़ते हैं।
नंदराज पहाड़ का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जल-जंगल-जमीन, आदिवासी अधिकार और खनिज आधारित विकास के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में खनन से संबंधित सरकारी निर्णय और ग्रामसभा की प्रक्रिया इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है।
