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रायपुर में महिला एवं बाल विकास विभाग से जुड़े विवाद ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। विभागीय जांच पूरी होने से पहले ही मंत्री कार्यालय द्वारा OSD के खिलाफ की गई कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। राजनीतिक हलकों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं तेज हैं।

जानकारी के अनुसार विभाग से जुड़े एक विवाद को लेकर पिछले कुछ दिनों से विपक्ष लगातार सरकार और मंत्री पर निशाना साध रहा था। सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर भी मामले को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा था। इसी बीच अचानक OSD को हटाने या उसके खिलाफ कार्रवाई किए जाने की खबर सामने आने के बाद पूरे घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया।

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब तक आधिकारिक जांच पूरी नहीं हुई और किसी एजेंसी ने अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की, तब तक किसी अधिकारी की जवाबदेही कैसे तय कर दी गई। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य प्रक्रिया के तहत पहले तथ्यों की जांच होती है, फिर जिम्मेदारी तय की जाती है और उसके बाद कार्रवाई होती है। लेकिन इस मामले में कार्रवाई पहले और जांच बाद में दिखाई दे रही है।

सूत्रों के मुताबिक विभाग के भीतर लंबे समय से कुछ अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं चल रही थीं। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ फैसले पर्दे के पीछे से संचालित किए जा रहे थे। वहीं विभाग में अधिकारियों की अटैचमेंट और लंबित जांच वाले अधिकारियों को जिम्मेदारी देने जैसी बातों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

विपक्ष ने पूरे मामले को सरकार की जवाबदेही से जोड़ते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि राजनीतिक दबाव कम करने के लिए एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है ताकि वास्तविक तथ्यों का खुलासा हो सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि OSD किसी मंत्री का प्रशासनिक सहयोगी होता है और बड़े निर्णय आमतौर पर उच्च स्तर पर लिए जाते हैं। ऐसे में किसी विवाद का पूरा ठीकरा केवल एक अधिकारी पर फोड़ना कई नए सवाल खड़े करता है।

इधर प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के बीच भी इस कार्रवाई को लेकर नाराजगी देखी जा रही है। कई अधिकारियों का मानना है कि यदि बिना जांच पूरी हुए कार्रवाई की परंपरा शुरू होती है, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था का मनोबल प्रभावित होगा और अधिकारी राजनीतिक विवादों में फंसने का डर महसूस करेंगे।

हालांकि मंत्री पक्ष की ओर से यह कहा गया है कि विभागीय अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से कदम उठाए गए हैं। इसके बावजूद पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

अब सभी की नजर जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि पूरे मामले में वास्तविक जिम्मेदारी किसकी थी और कार्रवाई कितनी उचित थी।