हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता।
“क्यों इतना तुम मुस्कुरा रहे हो,
क्या ग़म है जो तुम छिपा रहे हो?”
कभी-कभी किसी के चेहरे की मुस्कान देखकर मन में यही सवाल उठता है, क्योंकि हर मुस्कान खुशी की कहानी नहीं कहती। कुछ मुस्कानें अपने भीतर कई अनकहे दर्द और एहसास समेटे होती हैं।
समय बदल गया है, लोग बदल गए हैं और इस बदलते परिवेश में इंसान का मन भी शायद बदल गया है। पहले मन जैसा भीतर होता था, वैसा ही बाहर दिखाई देता था। लेकिन आज भीतर कुछ और और बाहर कुछ और होता है। इंसान मुस्कुराता तो है, पर ज़रूरी नहीं कि उसका मन भी खुश हो।
कहते हैं न—
“मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।”
आजकल ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जहाँ लोग अच्छे पदों पर हैं, उनके पास मान-सम्मान और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, फिर भी वे मानसिक रूप से संतुष्ट नहीं हैं। भीतर का खालीपन और असंतोष कभी-कभी उन्हें ऐसे गलत कदम उठाने की ओर ले जाता है, जिनके परिणाम बेहद दुखद होते हैं।
यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या पैसा, पद और प्रतिष्ठा ही जीवन में खुशी की गारंटी हैं? शायद नहीं! बाहरी सफलता के पीछे भी इंसान का अपना एक संघर्ष हो सकता है, जिसे वह मुस्कान के पीछे छिपाए रखता है।
हम अक्सर किसी को मुस्कुराते देखकर उसे खुश मान लेते हैं, जबकि उसकी मुस्कान कभी दूसरों के लिए, तो कभी अपने दर्द को छिपाने के लिए होती है। इसलिए हर मुस्कुराता चेहरा खुश हो, यह ज़रूरी नहीं।
हम दूसरों को खुश रखने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद से पूछना भूल जाते हैं—क्या मैं सचमुच खुश हूँ?
रिश्ते निभाना और दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करना ज़रूरी है, लेकिन इन सबके बीच अपने मन की अनदेखी करना भी ठीक नहीं। कभी अपनी पसंद का काम करना, अपने सपनों के लिए समय निकालना और छोटी-छोटी खुशियों को जीना भी आवश्यक है।
मन की बेचैनी को अनदेखा करने के बजाय उसे समझना चाहिए। यदि मन बहुत परेशान हो, तो किसी अपने से बात करने और मदद माँगने में संकोच नहीं करना चाहिए।
आख़िरकार, ज़िंदगी केवल दूसरों के लिए मुस्कुराने का नाम नहीं है। इसमें अपने लिए खुश रहना भी उतना ही ज़रूरी है।
मन को खुश रखना है, तो मन की भी कीजिए।
क्योंकि जब मन सचमुच खुश होगा, तभी चेहरे पर आई मुस्कान भी सच्ची होगी।
~ **दीप्ति विश्वकर्मा**
