भारत में परिवारों की बचत की आदतों में पिछले कुछ दशकों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां घरों में नियमित बचत को आर्थिक सुरक्षा का आधार माना जाता था, वहीं अब आसान कर्ज, क्रेडिट कार्ड और “बाय नाउ, पे लेटर (BNPL)” जैसी सुविधाओं ने लोगों के खर्च करने के तरीके को काफी प्रभावित किया है।
उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, 1990 के दशक में भारतीय परिवारों की वित्तीय बचत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 12% के आसपास थी। वहीं 2022-23 में यह घटकर करीब 5.1% रह गई, जो कई दशकों के सबसे निचले स्तरों में से एक मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की लागत में इजाफा, सीमित आय वृद्धि और आसान ऋण सुविधाओं ने लोगों की बचत क्षमता और व्यवहार दोनों को प्रभावित किया है। आज उपभोक्ताओं के पास EMI, क्रेडिट कार्ड और डिजिटल लोन जैसे कई विकल्प उपलब्ध हैं, जिससे तत्काल खरीदारी आसान हो गई है।
वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि कर्ज लेना हमेशा गलत नहीं होता, लेकिन जरूरत और भुगतान क्षमता को ध्यान में रखकर ही ऋण लेना चाहिए। वहीं नियमित बचत और आपातकालीन फंड बनाना आर्थिक सुरक्षा के लिए आज भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि उपभोक्ताओं को खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए। जिम्मेदारी के साथ वित्तीय निर्णय लेने से भविष्य की आर्थिक चुनौतियों का सामना करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
